क्या है Online Media का भविष्य, अभी क्या हालात हैं और आने वाले समय में क्या होगा? क्यों आज NDTV से ज्यादा बड़ा हो गया है NDTV.com? आपको क्या करना चाहिए? पढ़िए पूरी रिपोर्ट

what is wemedia

अभी क्या हो रहा है ऑनलाइन में –

मीडिया में मेरा करियर साल 2000 में शुरु हुआ था लेकिन ऑनलाइन जिसे आज Online Media का नाम दिया जाता है, उससे मैं 1997 से ही जुड़ा रहा हूं। 1997 में जब मैंने अपनी पहली स्पोर्टस वेबसाइट शुरु की थी, तब सोचा भी ना था कि 20 साल बाद ऑनलाइन मीडिया के मुद्दे पर किसी चर्चा में शामिल होंगा।

मौजूदा स्थिति ऐसी है जिसमें बड़े मीडिया हाउसिस ने अपने अपने पोर्टल लांच कर रखे हैं और अपने परंपरागत प्रॉडेक्ट के मुकाबले ऑनलाइन के जरीए ज्यादा अच्छा प्रॉफिट भी बुक रहे हैं।

उदाहरण के लिए NDTV की ताजा रिपोर्ट में उनके Dot Com डिविडन ने टीवी डिविजन के मुकाबले लगभग दोगुना प्रॉफिट बुक किया। अब क्या है ऑनलाइन मीडिया का फ्यूचर। क्या ऑनलाइन मीडिया का ये चरम है? पहले न्यूज़पेपर थे, फिर सरकारी रेडियो पर न्यूज़ आना शुरु हुई, फिर टीवी न्यूज चैनल्स आए और अब ऑनलाइन मीडिया।




सवाल मीडिया से?

सवाल ये कि न्यूजपेपर, रेडियो, टीवी के बाद मीडिया को ऑनलाइन मीडिया का जो नया रूप मिला है उसके बाद अब क्या होगा? सवाल ये भी क्या जो मीडिया हाउसिस ने 200-300 पत्रकारों की टीम बैठाकर पोर्टल चला रहे हैं वो आने वाले समय में बड़ी टीम के बोझ को झेल पायेंगे?

क्या आने वाले 5 से 8 साल में इनमें भी टीवी न्यूज़ की तरह ही छटनी होगी? सवाल ये भी क्या वाकई में 5 साल बाद ये पोर्टल अपने कर्मचारियों की सैलरी की जिम्मेदारियों के अलावा तकनीकी और प्रमोशन के स्तर पर बढ़ने वाले खर्चे को झेल पायेंगे? क्या वाकई में टीवी की रेटिंग फाइट की तरह ऑनलाइन मीडिया ट्रैफिक की लड़ाई में जिंदा रह पाएगा।

एक ये भी सवाल कि मीडिया के नए रूप ऑनलाइन मीडिया का अगला रूप क्या देखने को मिलेगा। शायद ये सवाल समय से काफी पहले पूछा गया लगे लेकिन सच्चाई ये है कि ऑनलाइन मीडिया के मामले में भारत बहुत देरी से एंटर हुआ है। इसलिए अतंर्राष्ट्रीय पर इस सवाल के जवाब की खोज भी शुरु हो चुकी है और कुछ हद तक जवाब भी मिल चुका है। जवाब मिला है UGC और PGC कॉन्टेंट मार्केट के रूप में।

इस पर थोड़ी में विस्तार से बात करूंगा, लेकिन थोड़ा जान लेते हैं कि कैसे ऑनलाइन मीडिया ने एक आम आदमी को खासतौर पर 25-30 साल के युवाओं को लाखों रूपए महीने और करोड़ों सालाना कमाने की जबरदस्त ताकत दे डाली है।




ऑनलाइन ख़बरों का बाजार

भारतीय मीडिया के आर्थिक तौर पर सफलता की अगर बात करें तो इसमें सिर्फ कुछ बहुत ही बड़े पैसे वाले लोंगो ने अच्छा पैसा कमाया है। लेकिन आम इंसान इससे कुछ खास नहीं कमा पाया। लेकिन ऑनलाइन मीडिया ने इस परेशानी को खत्म कर दिया।

कुछ उदाहरण देना चाहूंगा। जैसे टेक्नोलॉजी ब्लॉगिंग से देश में सबसे ज्यादा पैसा कमाने वाला शख्स आगरा जैसे टायर 2 शहर के अमित अग्रवाल है जिनकी कमाई 42 लाख रूपए महीने हैं। यानी जितना NDTV.com ने इस साल प्रॉफिट बुक किया है उसका लगभग 50 प्रतिशत तो इस युवा लड़के ने ऑनलाइन लिखकर ही कमा लिया।

इस लिस्ट में 10वें नंबर पर आने वाला शख्स भी 11-12 लाख रूपए महीने कमा रहा है। और ये सिर्फ टेक्नोलॉजी सेक्टर के लोग हैं। अभी तो 32 और सेक्टर मार्केट में है।

इंडियन मीडिया की परेशानी ये है कि वो कॉन्टेंट के नाम पर सिर्फ ख़बरों को लिखकर पोस्ट करने और उस पर आने वाले एड को ही ऑनलाइन मीडिया का बिजनस समझ रहा है। लेकिन खरबों रूपयो वाले इस बिजनस का यह सिर्फ एक हिस्सा है।

What is PGC और UGC?

पूरा ऑनलाइन मीडिया मुख्य रूप से दो हिस्सों में बंटा है। एक है PGC यानी Professionally Generated Content यानी टीवी, न्यूजपेपर्स और इनके वेब पोर्टल द्वारा तैयार किया जा रहा कॉन्टेंट। और दूसरा है UGC यानी यूजर जनरेटिट कॉन्टेंट जैसे Quora.com, यूसी न्यूज, न्यूज़डॉग, न्यूज रिपब्लिक इत्यादि।

इनको आप कॉन्टेंट Creator और Content Aggregator के तौर पर भी समझ सकते हैं।




PGC के फोर्मेंट पर काम करने वालों में वही मार्केट में टिक सकेगा, जो बिल्कुल हटकर ख़बर दे रहा हो। क्योंकि बड़े बड़े संस्थानों के ऑनलाइन पोर्ट का हाल लगभग वैसा ही हो गया है जैसा न्यूज़ टीवी चैनल्स का हो गया यानी हर जगह लगभग एक ही ख़बर। एक जगह रेप केस हो गया तो पूरा मीडिया अब सिर्फ उसी को पूरे दिन चलाएगा।

जबकि अगर UGC की बात करें, तो इस मार्केट में वही टिकेगा जिसके पास यूजर्स का बहुत बड़ा नेटवर्क हो और यूजर्स की बहुत ही ज्यादा Detailed Information का डाटाबेस बना हो। इक्का दुक्का को छोड़ दें तो फिलहाल भारतीय मीडिया हाउसिस में UGC कॉन्सेप्ट और Content Aggregator बिजनस पर किसी की वैसी नज़र नहीं है, जैसी होने की सख्त जरुरत है।

देश में इस समय करीब 2 दर्जन Content Aggregators आ चुके हैं जिनमें से करीब 6-7 बड़े या बहुत बड़े हैं। TOI भी अभी हाल ही में Content Aggregator के खेल में ऊतरा है, तो उम्मीद है कि जल्द ही इस मार्केट की शक्ल भी तेजी से बदलेगी।

WeMedia नाम से देश में ऑनलाइन मीडिया का नया रूप एंट्री कर चुका है। आने वाले समय में लगभग हर बड़े मीडिया हाउस को ऑनलाइन मार्केट में अपनी जगह बनाए रखने के लिए इसे शुरु करना ही होगा।




संभावनाएं

ऑनलाइन मीडिया का ये चरम नहीं है। चरम आने में लगभग 3-5 साल का वक्त लगेगा लेकिन तब इस खेल का बादशाह वही होगा तो पहले से ही इस खेल में अपनी जगह बना लेगा।

  1. गूगल की एक रिपोर्ट के (2015) मुताबिक में 94 प्रतिशत हिन्दी कॉन्टेंट आया जबकि इंग्लिश में ये वृद्धि सिर्फ 19 प्रतिशत की रही। हालांकि आज भी गूगल में कुल उपलब्ध कॉन्टेंट का सिर्फ 0.1 प्रतिशत ही हिन्दी कॉन्टेंट है।
  2. भारत में कुल 50 करोड़ (500 मिलियन) हिन्दी बोलने वाले लोग हैं।
  3. 2011 में जहां 10 करोड़ (100 मिलियन) इंटरनेट यूजर्स थे, वहीं अब हम दुनिया के दूसरे सबसे बड़े इंटरनेट यूजर्स का बाजार बन चुके हैं। (300 मिलियन – शायद पुरानी रिपोर्ट है। अब 420 मिलियन ताजा रिपोर्ट के मुताबिक हो चुका है।)
  4. देश में 2011 में जहां एक तरफ 2 करोड़ (20 मिलियन) मोबाइल इंटरनेट यूजर्स थे वहीं अब 40-45 करोड़ से ज्यादा यूजर्स हैं। साल के अंत तक ये संख्या 50 करोड़ होने वाली है।
  5. 2009 में भारत में इंटरनेट पेनीट्रेशन 2.2 प्रतिशत ही था लेकिन आज करीब 35 प्रतिशत हो गया है। जब 35 प्रतिशत इतना कमाल कर रहा है तो सोचिए कि इसका दोगुना होने पर क्या क्रांति आएगी। सरकार के मुताबिक 2020 तक ये संख्या दोगुनी हो जाएगी यानी 73 करोड़ (730 मिलियन)।
  6. IAMAI की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश में 42 करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं। करीब 62 प्रतिशत शहर और बाकी 38 प्रतिशत रूरल इंडिया से हैं।

2019 और 2020 का साल कॉन्टेंट की दुनिया के लिए एक नए रूप को लेकर आएगा और वो है शॉर्ट वीडियो। शॉर्ट वीडियो पर करीब 10 बहुत बड़ी कंपनियां दबे पांव काम शुरु कर चुकी है और 3-4 बड़ी कंपनियां तो इस मार्केट में एंटर भी हो चुकी हैं।




2019-20 में अगर आपको ऐसी ख़बरों पढ़ने को मिल जाए कि देश में टीवी की सेल में बहुत ज्यादा कमी देखी जा रही है तो हैरत में पड़ने की जरूरत नहीं होगी क्योंकि मोबाइल वीडियो कॉन्टेंट की दुनिया टीवी की जरूरत को काफी कम कर चुकी होगी।

फिलहाल देश में एक मोबाइल यूजर्स करीब कुल 3.5 घंटे देता है जबकि चीन, अमेरिका और यूरोप में यह लगभग 6 से 7 घंटे हैं। नेटफ्लिक ने पहले ही कई बड़े देशों में टीवी को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। इसी तरह अफ्रीका में भी iROKO TV परंपरागत टीवी चैनल्स के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।

कमाई के लिए सिर्फ एड हासिल कर लेना काफी नहीं है। आने वाले समय में इसी कॉन्टेंट के जरीए कंपनियां अपना सामान भी जबरदस्त ढंग से बेचेंगी। कुछ ने तो शुरुआत भी कर दी है। सबसे अच्छा उदाहरण है एक छोटी सी कंपनी जो बड़ा कमाल कर रही है। PopXo।

Niche Content देने वाले ही मार्कट में टिकेंगे।

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