पहली बार पूरा खुलासा, हरित क्रांति के बाद भी देश में क्यों नहीं सुधरी किसानों की आर्थिक हालत

Green Revolution in India

झूठे दावों की की असली सच्चाई जानें, किसानों की बदहाली का कारण छुपाया जा रहा है।

भारत में हर परिवार के घर में चाहे एक बीघा ही सही, लेकिन खेती की जमीन लगभग हर किसी के घर में मिल जाएगी। बेशक वो जमीन उन्होंने अपने किसी रिश्तेदार को बटाई पर खेती करने के लिए दे दी हो। ऐसे में कृषि प्रधान इस देश में हमेशा से ही एक सवाल पूछा जाता रहा है कि देश में किसानों की हालत खराब क्यों है जबकि हरित क्रांति से देश अन्न संपन्न हो चुका है। जो देश कभी अन्न विदेशों से मंगाता था अब वो कई गरीब देशों की जनता का पेट भरता है। लेकिन पिछले करीब 40 साल से पूछे जा रहे इस सवाल का जवाब भी एक ही मिलता है कि किसानों को उत्पादन बढ़ाना चाहिए।

लेकिन सच्चाई ये है कि ये सवाल और इसका जवाब दोनों ही झूठे हैं। कैसे? इस आर्टिकल में आपको नीच दिए गए क्रम में पूरी समस्या, समस्या की जड़, समस्या का गलत कारण दिखाना और असली कारणों का पूरी सच्चाई के साथ पता चल जाएगा।

समस्या क्या है

Green Revolution in India

1943 में ब्रिटिश राज के दौरान भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में (बांग्लादेश को भी मिलाकर) अन्न की कमी और भूख की वजह से 40 लाख लोग मर गए। इसके बाद जिस देश में दुनिया के सबसे ज्यादा किसान हो, यानी भारत में, वहां 1967 से लेकर 1977 के बीच हरित क्रांति आई और देश में अन्न की कमी खत्म हो गई। लेकिन समस्या ये है कि अन्न पैदा करने वाला किसान आज भी भूखा मर रहा है। क्यों? क्यों उसकी फसलों का सही दाम मार्केट में नहीं मिल पाता? क्यों अक्सर उसको अपनी लागत भी निकाल पाना मुश्किल हो जाता है?

 

मीडिया क्या करता है।

प्याज, आलू, टमाटर इत्यादि के दाम जरा से बढ़े नहीं कि टीवी चैनल्स इतने रोटा पीटना मचा देते हैं कि मानो देश कितने भारी महंगाई के गर्त में चला गया हो। जानकारी के लिए बता दूं कि दुनिया में सबसे ज्यादा जनसंख्या (80 करोड़ भारतीय) भारत के गांव में रहती है, जबकि चीन में 75 करोड़ लोग गांव में रहते हैं। सवाल ये कि अगर फसल की कीमत नहीं बढ़ेगी तो किसानो को फायदा कैसे होगा। अगर किसान खेती करना छोड़ देगा तो देर सवेर विदेश से और भी ज्यादा कीमत पर अन्न और सब्जियों का मंगानी पड़ेगी। जिंदा रहने के लिए खाना एसी में रहने से भी ज्यादा जरूरी है। इसका कोई विकल्प नहीं है। दूसरी तरफ अगर किसान आत्महत्या करता है तो मीडिया इसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराने लगता है। यानी पूरी तरह से Confused Reporting होती है। आलू के एक बीघा खेत में (956 वर्ग गज) करीब 40 से 50 बोरे आलू औसतन निकलता है, जिसकी लागत 25 हजार से लेकर 27 हजार रूपए आती है, यानी करीब 550 रूपए की औसत लागत जिसमें 50 एक बोरे में किलो आलू होता है। अगर एक बोरा 800 से 1000 रूपए का ना बिके तो किसान को खेती करने का कोई फायदा नहीं। यानी बाजार में अगर आपके किचन में आलू 23 से लेकर 30 रूपए प्रति किलो के हिसाब से ना बिके तो किसान आलू करने से तौबा कर ले या फिर आपका पेट भरने के लिए खुद भूखा मर जाए। यानी मीडिया अधूरे ज्ञान के साथ कुछ भी ख़बर चलाकर किसानों को मारने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।

हरित क्रांति की शुरुआत 70 के दशक में हुई
हरित क्रांति की शुरुआत 70 के दशक में हुई

कृषि एक्सपर्ट्स और सरकार क्या जवाब देते हैं।

इन सवालों का जवाब अगर कृषि विशेषज्ञों से पूछा जाता है तो वो पिछले करीब 40 साल से सिर्फ एक ही जवाब देते हैं कि जमीन घट रही है और उत्पादन किसानों ने बढ़ाया नहीं है। कभी वो नई तकनीक के इस्तेमाल की बात करते है, तो कभी केमिकलों के इस्तेमाल की। लेकिन सच्चाई कुछ और है, जो आपको इस आर्टिकल में आगे पता चलेगी।

विदेशों का भारत के मुकाबले उत्पादन क्या है।

भारत जैसे देश में गेंदू, आलू, चावल सबसे बड़ी और प्रमुख फसलें है। अगर एक्सपर्ट की बात को मान लें कि भारत को अपना उत्पादन बढ़ाना चाहिए तो वो समृद्ध हो जायेंगे, तो जरा आंकड़े देखिए जो जान लीजिए कि एक्सपर्ट का कहना सही है या गलत। अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, रूस, जापान जैसे दुनिया के बाकी बड़े देशों से काफी ज्यादा उत्पादन करता है भारत।

यदि सिंचाई की सुविधाओं का अभाव और निम्न फसल उत्पादकता कृषि संकट का एक कारण है तो क्यों किसानों में इस कदर निराशा छा गई है कि वे आत्महत्या के लिए विवश हो गए हैं? उन्हें तो पंजाब जैसे प्रगतिशील राज्य में पूरी तरह खुशहाल जीवन व्यतीत करना चाहिए। किसानों की आय बढ़ाने के लिए जितने भी नुस्खे बताए जाते हैं वे पूर्णत: गलत हैं। कृषि अर्थशास्त्री सारा ठीकरा किसानों के सिर पर फोड़ते आ रहे हैं। एक ऐसे राज्य में जहां 98 फीसद खेती सिंचाई के दायरे में है और जहां फसल पैदावार अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करती है, मुझे ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता कि वहां के किसान आत्महत्या करें। आर्थिक सर्वेक्षण 2016 के अनुसार गेहूं की प्रति हेक्टेयर पैदावार 4500 किग्रा रही, यह अमेरिका में प्रति हेक्टेयर गेहूं की उपज के बराबर है।

हरित क्रांति की शुरुआत 70 के दशक में हुई
हरित क्रांति की शुरुआत 70 के दशक में हुई

पंजाब में प्रति हेक्टेयर धान की उत्पादकता 6000 किग्रा रही। यह चीन में प्रति हेक्टेयर धान की उत्पादकता के करीब-करीब बराबर है। फसल उत्पादकता की यह ऊंची दर और सिंचाई के प्रचुर साधन होने के बाद भी पंजाब के किसानों को आत्महत्या क्यों करनी चाहिए? यहां मैं चंडीगढ़ स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ डेवेलपमेंट एंड कम्युनिकेशन के प्रोफेसर एचएस शेरगिल द्वारा किए गए एक अध्ययन की कुछ बातों को रखना चाहूंगा। उन्होंने मशीनीकरण, रासायनिक प्रौद्योगिकी, पूंजी उपलब्धता, उत्पादकता आदि मानकों के आधार पर पंजाब की कृषि को विकसित देशों की कृषि से तुलना की है।

अध्ययन के अनुसार प्रति एक हजार हेक्टेयर पर टैक्टरों की संख्या पंजाब में जहां 122 पाई गई है, वहीं अमेरिका में 22, ब्रिटेन में 76 और जर्मनी में 65 है। प्रति हेक्टेयर खाद के प्रयोग में पंजाब 449 किग्रा के साथ शीर्ष पर है, जबकि अमेरिका में प्रति हेक्टेयर 103 किग्रा, ब्रिटेन में प्रति हेक्टेयर 208 किग्रा और जापान में प्रति हेक्टेयर 278 किग्रा खाद का प्रयोग होता है। पंजाब में सिंचित क्षेत्र 98 फीसद है, जबकि अमेरिका में 11.4 फीसद, ब्रिटेन में दो फीसद और जापान में 35 फीसद है। अब फसल पैदावार की स्थिति का जायजा लेते हैं। पंजाब में गेहूं, चावल और मक्का के 7633 किग्रा प्रति हेक्टेयर वार्षिक पैदावार के साथ शीर्ष पर है। दूसरी ओर अमेरिका 7238 किग्रा प्रति हेक्टेयर, ब्रिटेन 7008 किग्रा प्रति हेक्टेयर, फ्रांस 7460 किग्रा प्रति हेक्टेयर और जापान 5920 किग्रा प्रति हेक्टेयर के साथ काफी पीछे है।

असली कारण क्या है – नौकरी बनाम किसान

जाहिर है कि यदि पैदावार में बढ़ोतरी को समृद्धि का एक मानक बनाएं तो पंजाब में किसानों की आत्महत्या को कोई कारण नजर नहीं आता। दरअसल अर्थशास्त्री यह मानने को तैयार नहीं हैं कि किसानों को उनकी पैदावार की मिलने वाली निम्न कीमत ही कृषि संकट के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। 11970 में गेहूं का खरीद मूल्य 76 रुपये प्रति क्विंटल था। 2015 में गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 1450 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया। पिछले 45 सालों में इसमें 19 गुना बढ़ोतरी हुई है। अब इसी काल में दूसरे क्षेत्रों की आय में वृद्धि के आंकड़े देखें:

सरकारी कर्मचारियों के वेतन (सिर्फ मूल वेतन और महंगाई भत्ते में) में 120 से 150 गुना बढ़ोतरी हुई है। कॉलेज/ विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के वेतन में 150 से 170 गुना बढ़ोतरी हुई है। स्कूली शिक्षकों का वेतन तो 280 से 320 गुना बढ़ गया है। सातवें वेतन आयोग में एक चपरासी का वेतन प्रति महीने 18000 रुपये तय किया गया है। ऐसे समय जब ठेका मजदूर की मासिक मजदूरी दस हजार रुपये तय की गई है और हरियाणा जैसे राज्य बेरोजगार युवाओं को नौ हजार रुपये मासिक भत्ता देने का इरादा जता रहे हैं तब पंजाब के किसानों की औसत मासिक आय बहुत ही कम नजर आती है।

हरित क्रांति की शुरुआत 70 के दशक में हुई
हरित क्रांति की शुरुआत 70 के दशक में हुई

कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) के अनुसार गेहूं और चावल की पैदावार से पंजाब के किसानों को प्रति हेक्टेयर तीन हजार रुपये आय होती है। इस पैसे से जीवन गुजारना कठिन है। सवाल यह खड़ा होता है कि जब पंजाब के किसानों की कृषि उत्पादकता अमेरिकी किसानों की तुलना में अधिक है तब उनकी आय इतनी कम क्यों है?1समाज के दूसरे क्षेत्र में वेतन वृद्धि को देखते हुए यदि इसी कालखंड में खरीद मूल्य में सौ गुना बढ़ोतरी को न्यूनतम मानदंड बनाया जाए तो गेहूं की कीमत प्रति क्विंटल 7600 रुपये होनी चाहिए। गेहूं की यह वैध कीमत है जिसे किसानों को देने से इंकार किया जाता रहा है।

कृषि अर्थशास्त्रियों को यह मानना होगा कि कृषि संकट के लिए आय वितरण में भारी असंतुलन जिम्मेदार है। स्पष्ट है कि पहली जरूरत यह सुनिश्चित करने की है कि किसानों की मासिक आय कम से कम निचले स्तर के सरकारी कर्मचारी के मासिक वेतन के बराबर हो।

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2 thoughts on “पहली बार पूरा खुलासा, हरित क्रांति के बाद भी देश में क्यों नहीं सुधरी किसानों की आर्थिक हालत

  1. Dear Pushpandra
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